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Menstrual problem

 1.मासिक धर्म की समस्या(Menstrual problem)

मासिक धर्म की समस्याओं की सूची(How can we solve the problem of periods?)

Menstrual problem

                        Menstrual problem

मासिक धर्म सम्बंधी समस्या, जिसे रक्तप्रदर या अत्यार्त्तव(Men-orrhagia)कहते हैं,से संबंधित जानकारी और होम्योपैथिक उपचार 

यौवनारम्भ होने पर किसी भी लड़की के जीवन में मासिक धर्म आरंभ होना इस बात की सूचना देता है कि वह अब गर्भधारण करने योग्य हो गई है। यौवनारम्भ के वक्त जीवन में प्रथम बार होने वाले मासिक धर्म को रजोदर्शन(Menarche) कहते हैं। वैसे तो यह 12 से 18 वर्ष की आयु के बीच कभी भी शुरू हो सकता है पर आजकल ज्यादातर लड़कियों को 11 से 15 वर्ष की आयु के बीच मासिक धर्म होना प्रारम्भ हो जाता है। मासिक धर्म का नियमित होना स्त्री के अच्छे आंतरिक स्वास्थ्य को दर्शाता है। वैसे तो 28 दिन के समय अंतराल से चार-पांच दिन की समयावधि तक होने वाले मासिक रक्तस्राव को सामान्य मासिक धर्म माना जाता है लेकिन इस समय अंतराल में 2 दिन कम या ज्यादा होना भी सामान्य ही होता है यानी 26 या 30 दिन के समय अंतराल से होने वाले मासिक धर्म भी सामान्य और स्वस्थ ही होते हैं। यह मासिक धर्म यौवनारंभ से लेकर 45 से 50 वर्ष की आयु तक हर माह होता रहता है।45 से 50 वर्ष की आयु के बीच इसका  होना बंद हो जाता है जिसे  रजोनिवृत्ति(Menopause)कहते हैं।

 मासिक धर्म को संचालित और नियमित रखने  वाले दो हारमोन्स होते हैं जिन्हें ईस्टोजन और प्रोजेस्टेरॉन कहते हैं। मुख्यतः डिम्बाशय में बनने वाले इन दोनों हारमोन्स के लयबद्द संतुलन से ही मासिक धर्म का नियमन होता है। महिलाओं में मासिक धर्म से संबंधित कई समस्या होती है जैसे मासिक धर्म से पूर्व लक्षणों की उत्पत्ति जिसे प्रागार्तव तनाव संलक्षण(Premenstrual Tension Syndrome) कहते है,अत्यार्तव या रक्तप्रदर(Menorrhagia, Metrorrhagia),अनार्तव यानी मानसिक धर्म न होना(Amenorrhea), कष्टार्तव यानी कष्ट के साथ मासिक धर्म होना(Dysmenorrhoea), रजोनिवृत्ति संबंधी लक्षण(Menopausal Symptoms)रजोनिवृत्ति उपरांत रक्तस्राव(Postmenopausal Bleeding)आदि। इन सब समस्याओं के पीछे कई कारण होते हैं। चूंकि कभी-कभी इन समस्याओं, खासकर अत्यार्तव के पीछे कोई गंभीर कारण जैसे कैन्सर भी होता है अतः इन समस्याओं को नजरअंदाज न करते हुए तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए।इस बार हम अत्यार्तव यानी सामान्य से अधिक रक्तस्राव होना,पर चर्चा कर रहे हैं।

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2.अनियमित पीरियड्स की समस्या(Irregular periods problem)

अत्यार्तव यानी रक्तप्रदर (Menorrhagia)

जब सही समय पर होने वाले मासिक धर्म में रक्तस्राव सामान्य से अधिक मात्रा में और अधिक समयावधि तक होता है तो उसे अत्यार्तव या रक्तप्रदर कहा जाता है। चिकित्सकीय भाषा में इसे(Dysfunctional Uterine Bleeding (DUB) भी कहा जाता है। अर्थात् एक सामान्य मासिक धर्म में 25 से 80ml के बीच रक्त स्राव होता है जिसकी अवधि 4 से 5 दिन होती है इसलिए यदि रक्तस्राव 80ml से अधिक हो तथा 7-8 दिन तक चले तो इस स्थिति को अत्यार्तव कहा जाता है।

 कारण(reason)

 अत्यार्तव कई कारणों से होता है जिनमें से प्रमुख कारण इस प्रकार है-

(1).हारमोन्स का असंतुलन(Hormonal Imbalance)- 

एक स्वस्थ सामान्य मासिक चक्र में ईस्टोजन और प्रोजेस्टेराॅन हारमोन्स के बीच के संतुलन से गर्भाशय की आंतरिक परत(Endo-metrium) विकसित होती है ताकि निषेचित डिम्ब  उसमें सही तरीके से आरोपित हो सके।यदि

निषेचन नहीं होता है तो यह विकसित परत झड़कर मासिक स्राव के साथ बाहर निकल जाती है‌। यदि इन हारमोन्स के बीच असंतुलन पैदा हो जाता है तो यह आन्तरिक परत  अधिक विकसित हो जाती है और जब यह बढ़ी हुई परत झड़ती है तो रक्तस्राव भी अधिक कराती हैं।इसी तरह कुछ शारीरिक अवस्थाएं ऐसी होती है जिनमें हार्मोंन्स के असंतुलन से मासिक धर्म में भी परिवर्तन होता है जैसे मासिक धर्म आरंभ होनेवाले के बाद के उस महीने (Puberty Menorrhagia),किसी भी गर्भपात के बाद का महीना, प्रसव के बाद के कुछ महीने तथा रजोनिवृत्ति की अवस्था आदि। अवस्थाओं में हारमोंस के असंतुलन से मासिक धर्म अधिक रक्तस्राव वाला होता है।

(2). डिम्बाशय की दुश्क्रिया(Ovarian Dysfunction)-

 यदि किसी मासिक चक्र में डिम्बाशय से डिम्ब न निकले यानि डिम्बाशय(Ovulation) न हो तो प्रोजेस्टेरॉन का स्तर कम होने से मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होता है। दरअसल डिम्बाशय के जिस स्थान से  निकलता है वहां की कोशिकाएं ही प्रोजेस्टेराॅन हारमोन का निर्माण करती है।

डिम्बरहित मासिक चक्र(Anovulatory Cycle) मुख्यतः दो आयु वर्ग में देखा जाता है।पहला यौवनारंभ के समय जब लड़की के जीवन में मासिक धर्म शुरू होता है और दूसरा जब रजोनिवृत्ति की अवस्था आती है यानी 45 से 50 वर्ष की आयु के बीच तो यौवनारम्भ होने के बाद कुछ महीनों में  रजोनिवृत्ति होने के पूर्व कुछ महीनों में तथा रजोनिवृत्ति होने के पूर्व के कुछ महीनों में अत्यार्तव की शिकायत  अधिक देखने को मिलती है ।इसके अलावा डिम्बाशय  में सिस्ट बनने वाला रोग (Polycystic Ovarian Disease)भी अत्यार्तव का एक कारण होता है ।

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(3).गर्भाशय में तंतु अर्बुद(Uterine Fibroid)- 

गर्भाशय में छोटी-छोटी तंतुओं से बनी गठानें (Fibroids)हो जाती है जो कैंसर की गठानें तो नहीं होती पर मासिक धर्म के दौरान अधिक मात्रा में और अधिक समयावधि तक रक्तस्त्राव करवाती है।

(4).गर्भाशय में पॉलिप(Uterine Polyp)-हारमोन्स के असंतुलन विशेषकर ईस्टोजन हार्मोन के अधिक स्तर होने से गर्भाशय और इसकी ग्रीवा में झिल्लियों से बनी छोटी-छोटी डंठल युक्त गठानें हो जाती है जिसके कारण अत्यार्तव होता है।

(5).एडिनोमायोसिस और एंडोमेटि-ओसिस(Adenomyosis and Endometriosis)

 जब गर्भाशय की आंतरिक परत(Endometrium) बढ़ कर इसकी पेशीय परत(Myometrium) में धंस जाती है तो इसे एडिनोमायोसिस(Adeno-myosis) कहते हैं। जब गर्भाशय की आंतरिक परत अन्य स्थानों पर पायी जाती है तो इसे एंडोमेटि-ओसिस(Endometriosis) कहते हैं। इन दोनों अवस्थाओं में अत्यार्तव होता है।

(6). गर्भ निरोधक उपाय-(Contraception)-

लंबे समय तक गर्भ-निरोधक गोलियों का सेवन कर इन्हें बंद करने पर हारमोंस के असंतुलन से कुछ मासिक धर्म अधिक रक्तस्त्राव वाले होते हैं पर समय से यह ठीक हो जाता है।

 गर्भाधान रोकने का एक उपाय होता है प्लास्टिक और तांबे से बने एक उपकरण (काॅपर-टी) को गर्भाशय के अंदर रखना(Intrauterine Contraceptive Device) कई बार काॅपर-टी लगाने पर या ज्यादा समयावधि तक काॅपर-टी लगाये रखने आदि कारणों से यह तकलीफ उत्पन्न हो जाती है।काॅपर-टी निकाल देने से तकलीफ दूर हो जाती है ।

(7).गर्भपात (Abortion)-

नियमित समय पर ना होकर देर से होने वाला अधिक रक्तस्त्राव युक्त मासिक धर्म के पीछे गर्भपात कारण हो सकता है। कई बार निषेचित डिम्ब(भ्रूण)  गर्भाशय के स्थान पर डिम्बवाहिनी में आरोपित हो जाता है, इसे अस्थानिक गर्भावस्था(Ectopic Pregnancy) कहते हैं।इसमें भी अत्यार्तव होता है।

(8).रक्तविकार(Blood Dyscrasia)- 

कई बार वंशानुगत या अन्य कारण से शरीर से होने वाले रक्तस्त्राव को बंद करने की स्वाभाविक प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है जिससे मासिक धर्म के दौरान अधिक समयावधि तक रक्तस्त्राव होता है।

(9). कैंसर (Cancer)-

कुछ मामलों में अत्यार्तव के पीछे गर्भाशय, डिम्बाशय या गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर कारण होता है। 

(10).अन्य कारण(other reason)

कुछ और कारण भी हैं जिनसे यह समस्या उत्पन्न होती है वो है-श्रोणी क्षेत्र में शोथ, थाॅयराइड या पिट्यूटरी  ग्रंथियों के विकार, गुर्दे या लीवर के रोग, कुपोषण, खून की कमी, शारीरिक या मानसिक तनाव, आदि।

लक्षण(symptoms)

नियमित समय पर होने वाले मासिक धर्म में रक्तस्राव 7 दिन से अधिक दिन तक होता है और मात्रा ज्यादा होने से कुछ घंटों तक हर घंटे में एक या ज्यादा सेनेटरी पैड बदलना पड़ता है।रक्तस्राव के कारण महिला के दैनिक कार्य प्रभावित होते हैं और यदि इसके कारण खून की कमी आ गयी हो तो चक्कर आना,थकान रहना,श्वास फूलना आदि लक्षण भी उत्पन्न होते हैं ‌। गर्भपात होने पर तीव्र दर्द के साथ अधिक रक्त स्त्राव होता है। 

3.मेटोरिह्जिया(Metrorrhagia)

इस प्रकार के रक्तप्रदर में रक्तस्त्राव दो मासिक धर्म के बीच होता है यानी मेनोरेह्जिया का तरह इसका नियमित मासिक धर्म से संबंध नहीं होता है।

कारण(cause)

इसके भी लगभग वही कारण होते हैं जो हमने मेनोरेह्जिया में बतलाये हैं यानी हारमोंस का असंतुलन (प्रोस्टेरोॅन का कम और ईस्टोजन का अधिक स्तर), स्थानिक चोट, संक्रमण या शोथ,गर्भाशय में पाॅलिप,छाले, गांठें या कैंसर, गर्भनिरोधक गोलियां या उपकरण, थाॅयराइड ग्रंथि की विकृति, कुपोषण,अस्थानिक गर्भाशय, आदि कारणों से दो मासिक धर्मों के बीच में रक्तस्त्राव होता है।

लक्षण(symptoms)

इसमें ज्यादा, कम या सिर्फ स्पाॅटिंग(अधोवस्त्र पर धब्बा लगना) के रूप में हो सकता है। पेट में दर्द या ऐंठन हो सकते हैं या नहीं भी हो सकते हैं।

जांच(Investigations)

 इन दोनों प्रकार के मासिक धर्म संबंधी समस्या के लिए रोग से पूछताछ के अलावा कुछ सामान्य और कुछ विशेष जांच की जाती है जिनसे यह निदान हो जाता है कि समस्या की उत्पत्ति का कारण क्या होता है ।

(1).खून की जांच(Blood test)

इससे खून की कमी, संक्रमण या खून का कोई विकार होने का पता चलता है।

(2).हारमोंस(Harmons)

रक्त में थाॉयराइड हार्मोन के स्तर के जांच करने से यह ज्ञात हो जाता है कि अधिक रक्तस्राव होने के पीछे इस ग्रन्थि का कोई विकार तो कारण नहीं है ।थाॅयराइड की समस्या आजकल बहुत बढ़ गयी हैं।

(3).अल्ट्रासोनोग्राफी(Ultrasonography)

जांच का यह साधन रोगीयों और चिकित्सकों के लिए एक  वरदान साबित हुआ है क्योंकि इसके द्वारा गर्भाशय में गठान हो या सूजन हो, डिम्बाशय में गठान या सिस्ट हो,श्रोणीक् क्षेत्र में किसी प्रकार का विकार या शोथ, इन सब कारणों का पता चल जाता है।

(4).अन्य जांचें(Check other)

रोगिणी के अनुसार कुछ विशेष जांचें भी की जाती है जैसे D और C डाइलेशन एंड क्यूरेटाज (Dilation and Curettage)जिसमें गर्भाशय की आंतरिक परत को खुरच कर उसकी जांच की जाती है या पेप स्मीअर(Pap Smear) जिसमें गर्भाशय ग्रीवा की आंतरिक सतह का नमूना लिया जाता है ताकि कैंसर है या नहीं यह ज्ञात हो।

Menstrual problem

                Menstrual problem

4.पीरियड्स की समस्या को कैसे हल करें(How to solve periods problem)

होम्योपैथिक चिकित्सा(Homeopathic medicine)

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में मासिक धर्म की समस्याओं को दूर करने वाली कई औषधियां है  जिनके किसी तरह के दुष्परिणाम नहीं होते हैं। उपरोक्त दोनों प्रकार के गर्भाशय से होने वाले रक्तस्त्राव में लाभकारी कुछ मुख्य होम्योपैथिक औषधियों का विवरण यहां प्रस्तुत किया जा रहा है-

मेनोरेह्जिया की चिकित्सा(Treatment of menorrhagia)

इस समस्या में उपयोगी मुख्य औषधियां मुख्य औषधियां इस प्रकार हैं-

 (1).कैल्केरिया कार्ब(Calcarea carb)

यदि रोगिणी का शरीर मोटा हो, पसीना ज्यादा आता हो,शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलती हो, रक्तस्त्राव समय से पहले, ज्यादा व लंबे समय तक चलता हो, स्राव के समय चक्कर आते हों, पेट में तीव्र दर्द होता हो, मासिक धर्म  के पहले व बाद में जननांगों में खुजली व जलन होती हो और थोड़ी सी उत्तेजना से रक्तस्त्राव होने लगता हो तो ऐसे लक्षणों मैं कैल्केरिया कार्ब 30 शक्ति की 6-6 गोलियां दिन में 3 बार देने से बहुत लाभ होता है।

 (2).मिलीफोलियम(Millifolium)

यह मेनोरेह्जिया की बहुत अच्छी दवा है। यदि रक्तस्राव समय से पहले हो, रक्त रंग एकदम लाल हो, रक्तस्त्राव बहुत अधिक हो तो ऐसे लक्षणों में मिली फोलियम मदर टिंक्चर की 20 20 बूंदे एक चौथाई कप पानी में दिन में 3 बार देने से लाभ होता है।

(3).सीपिया(Sepia)

यह भी अनियमित मासिक धर्म की बहुत अच्छी औषधि होती है। इसके लक्षण इस प्रकार हैं- रोगिणी का शरीर दुबला पतला होता है, श्वेत प्रदर की शिकायत रहती है चेहरे पर झाइयां होती है, दोनों गालों पर दाग होते हैं जो नाक के ऊपर जाकर मिलते हैं,रोगिणी उदासीन होती है और उसका किसी काम में मन नहीं लगता, रोगिणी के जननांगों में ढीलापन होता है जिसकी वजह से ही उसे यह महसूस होता है जिसकी वजह से उसे यह महसूस होता है उसके अंदरूनी अंग गर्भाशय आदि बाहर आ जाएंगे इसलिए वह हमेशा जांघ पर जांघ रखकर बैठती है, ऋतुस्त्राव ज्यादा व जल्दी होता है या देर से और कम भी हो सकता है, तीव्र दर्द होता है जो पीछे से आगे की तरफ आता है उपरोक्त लक्षणों में सीपिया 30 बहुत अच्छा काम करती है।

 (4).फ्रैक्सिनस अमेरिकाना(Fraxinus americana)

यदि अत्यार्तव गर्भाशय में का गठान, सूजन या आकार वृद्धि के कारण हो तो यह दवा काफी कारगर है। यह फॉयब्राइड को खत्म कर देती है और अधिकांश मामलों में ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ती है। इसके मदर टिंक्चर की 15-15 बूंदे आधा कप पानी में दिन में 3 बार दें।

मेटोरेह् जिया की चिकित्सा- इस समस्या की मुख्य औषधियां इस प्रकार है-

 (1).इपिकाक(Ipikak)

इसके लक्षण है ऋतुस्त्राव 15-15 दिन के अंतर से होना,रक्तस्राव ज्यादा होना, घबराहट व उल्टी होना, नाभि के आसपास तेज दर्द होना, दर्द का नाभि से चलकर गर्भाशय तक जाना। घबराहट होना इस दवा का मुख्य लक्षण है। इसकी 200 शक्ति की 6-6 गोली दिन में 3 बार देनी चाहिए।

(2).सेबाइना(Sebina)

 यह मेटोरेह् जिया की मुख्य औषधि है। 15-15 दिन में रक्तस्राव होना, रोगिणी की गर्भपात की प्रवृत्ति होना, रक्तस्त्राव अधिक चमकीला लाल या काले थक्केदार होना आदि लक्षणों की उपस्थिति में सेबाइन 30 शक्ति की6-6 गोली दिन में 3 बार देने से लाभ होता है।

नोट-ज्यादा समस्या होने पर चिकित्सा से परामर्श लें।




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